करेंट अफेयर्स 2024 : जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) | GI tag (Geographical Indication)
Posted on Mar 06 2024 | Author: Ashok Sharma
- जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेतक किसी उत्पाद को उसके मूल क्षेत्र से उसकी पहचान के लिए दिया जाता है। जीआई टैग मिलने के बाद उस उत्पाद को कानून से संरक्षण मिल जाता है। इसका मतलब है मार्केट में उसी नाम से दूसरा कोई प्रोडक्ट नहीं लाया जा सकता। साथ ही जीआई टैग प्राप्त होने पर उस उत्पाद की गुणवत्ता को भी मान्यता मिलती है।
मार्च 2024 की शुरुआत में जिन्हें जीआई टैग मिला है, वे हैं-
- कटक की चांदी तारकशी
- त्रिपुरा के रिसा परिधान
- रतलाम की रियावन लहसुन
- माजुली की मुखौटा बनाने व पांडुलिपि पेंटिंग
कटक की चांदी तारकशी
- ओडिशा के कटक की प्रसिद्ध चांदी तारकशी को जीआई टैग मिला है। चांदी के शहर कटक की सदियों पुरानी यह प्रसिद्ध कला अलग ही प्रकार की है। कटक में दुर्गा पूजा के दौरान जटिल चांदी तारकशी की मदद से झांकियां सजाई जाती हैं।
त्रिपुरा का रिसा परिधान
- त्रिपुरा के आदिवासी समुदाय द्वारा पारंपरिक हाथ से बने कपड़े रिसा को जीआई टैग मिला है। रिसा हाथ से बुना कपड़ा है, जिसे महिलाएं ऊपरी परिधान के रूप में और सम्मान व्यक्त करने के लिए हेडगियर, स्टोल के रूप में धारण करती हैं।
रतलाम की रियावन लहसुन
- मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में पैदा होने वाली लहसुन की रियावन किस्म को जीआई टैग प्रदान किया गया है। इस लहसुन में पांच-छह कलियां ही होती हैं, लेकिन स्वाद तीखा और तेज होता है। इसमें तेल की मात्रा भी अधिक होती है।
माजुली की मुखौटा कला और पांडुलिपि पेंटिंग
- असम में मास्क बनाने की कला और पांडुलिपि पेंटिंग के लिए मशहूर माजुली को जीआई टैग मिला है। मुख शिल्प यानी मुखौटा बनाने की कला मांजुली की संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। इस कला की शुरुआत मध्य युग में संत शंकरदेव ने नव-वैष्णववाद के दौरान की थी। संत शंकरदेव ने अपनी शिक्षाओं को फैलाने के लिए मुखौटा कला का उपयोग किया था।
- इसी तरह माजुली की पांडुलिपि पेंटिंग को भी जीआई टैग प्रदान किया गया है। इसके तहत रामायण, महाभारत और भागवत पुराण की कहानियों को पेंटिंग के माध्यम से दर्शाया जाता है। गर्गायन लिपि, कैथल और बामुनिया इस क्षेत्र की तीन लोकप्रिय पांडुलिपि लेखन शैलियां हैं।